राह
ये दुःख सहा ना जाए
तोसे कहा ना जाए
दर्शन को तरसी है आँखे
साजन, अब तो आजावे
बरसोंसे बरसा जाए सावन
फिर भी आग दिल की न बुझ पावे
आदत है येतो राह तकती
मुझको बिरहन बानाये।
अरज मोरी काहे नाही सुने
पीया बिन बाग़ भी बंजर रे
तोसे देखाने का मन ये चाहे
बोल तू कासे ना आवे?
-अमित श्री . खरे
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